संगठन में विवेकपूर्ण नेतृत्व
**********
प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe
ज़्यादातर ISO 9001 QMS प्रमाणन प्राप्त संगठनों में नियमावली, प्रक्रियाओं और प्राधिकारों (Authorities) का स्पष्ट उल्लेख किया जाता है। विभिन्न पदों की भूमिकाएँ, जिम्मेदारियाँ, अधिकार तथा कार्यविधियाँ विस्तार से निर्धारित की जाती हैं। ऐसी संरचना आवश्यक भी है, क्योंकि यही व्यवस्था संगठन में अनुशासन, जवाबदेही और कार्यक्षमता सुनिश्चित करती है।
फिर भी, वास्तविक परिस्थितियों में नेतृत्व शायद ही कभी केवल तय नियमों के अनुसार कार्य करता हो। संगठनात्मक वातावरण स्थिर नहीं होता। इंसानी भावनाएँ जटिल होती हैं, परिस्थितियाँ तेजी से बदलती हैं, और कई बार ऐसे हालात उत्पन्न हो जाते हैं जिनका पूर्ण अनुमान कोई लिखित कार्यविधि या नियमावली पहले से नहीं लगा सकती। ऐसे समय में केवल नियम पर्याप्त या सहायक नहीं होते; यह नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा का समय होता है।
जब कोई प्रक्रिया केवल लिखित नियमों तक सीमित रह जाती है, तब प्राधिकार मात्र प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाता है। वह नियमों का पालन तो करवा सकता है, लेकिन हर स्थिति में न्यायपूर्ण निर्णय नहीं दे सकता। सच्चे नेतृत्व के लिए कुछ और आवश्यक होता है। भारतीय दर्शन इसे एक गहरे शब्द में व्यक्त करता है - “विवेक”। विवेक केवल ज्ञान (Knowledge) नहीं है; यह सही और सुविधाजनक, नियम और न्याय, तथा शब्द और भावना के बीच अंतर समझने की क्षमता है। यही आंतरिक स्पष्टता व्यक्ति को बदलती परिस्थितियों में सिद्धांतों को समझदारी से लागू करने योग्य बनाती है।
वर्तमान प्रशासनिक और प्रबंधन व्यवस्था में अक्सर “विवेकाधीन शक्ति” (Discretionary Power) की बात होती है। यह किसी पद (Position) के साथ मिलने वाला अधिकार है, जिसके अंतर्गत व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकता है। लेकिन विवेकाधीन शक्ति और विवेक दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं। विवेकाधीन शक्ति नेतृत्व का बाहरी अधिकार है, जबकि विवेक उसके भीतर से उत्पन्न नैतिक समझ है।
यदि निर्णय लेने की स्वतंत्रता विवेक से नियंत्रित न हो, तो उसके मनमाने, पक्षपातपूर्ण या तात्कालिक भावनाओं से प्रभावित होने का खतरा रहता है। परंतु जब वही शक्ति विवेक से जुड़ जाती है, तब वह न्याय, संतुलन और नैतिकता का माध्यम बन जाती है। लिखित नियमावली यह बता सकती है कि क्या करने की अनुमति है, लेकिन विवेक यह तय करता है कि क्या वास्तव में उचित है।
आज अधिकांश संगठन नीतियों (Policies), प्रक्रियाओं और अनुपालन ढाँचों (Compliance Frameworks) के आधार पर संचालित होते हैं। यह आवश्यक भी है, क्योंकि इनके बिना संगठनात्मक स्थिरता संभव नहीं। ISO 9001 QMS मानक भी प्रक्रियाओं की स्पष्टता, जिम्मेदारियों की परिभाषा, जोखिम-आधारित सोच और जवाबदेही पर विशेष बल देता है। लेकिन यह मानक केवल प्रक्रिया पालन (Process compliance) तक सीमित नहीं है; यह नेतृत्व (Leadership), गुणवत्ता संस्कृति (Quality culture), लोगों की सहभागिता (Participation of people) और निरंतर सुधार (Continual improvement) को भी महत्व देता है।
ISO 9001 QMS मानक के Clause 5 में नेतृत्व से अपेक्षा की गई है कि वह केवल नियंत्रण और अनुपालन सुनिश्चित न करे, बल्कि संगठन के लोगों में गुणवत्ता के प्रति प्रतिबद्धता और सकारात्मक कार्य-संस्कृति भी विकसित करे। यही वह स्थान है जहाँ विवेकपूर्ण नेतृत्व की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी ग्राहक की शिकायत निर्धारित समय सीमा के बाद प्राप्त होती है, तो प्रक्रिया के अनुसार उसे अस्वीकार किया जा सकता है। लेकिन यदि यह स्पष्ट हो कि समस्या संगठन की किसी कमी के कारण उत्पन्न हुई है, तो एक विवेकपूर्ण नेता प्रक्रिया की भावना को समझते हुए ग्राहक को उचित समाधान देने का प्रयास करेगा। ऐसा निर्णय नियम तोड़ना नहीं, बल्कि गुणवत्ता प्रबंधन के मूल उद्देश्य "ग्राहक संतुष्टि और विश्वास" को प्राथमिकता देना है। इसी प्रकार, यदि कोई कर्मचारी पहली बार किसी प्रक्रिया के संचालन में त्रुटि कर देता है, तो केवल दंडात्मक कार्रवाई करना एक आसान विकल्प हो सकता है। परंतु विवेकपूर्ण नेतृत्व गलती के मूल कारण (Root cause) को समझने, प्रशिक्षण प्रदान करने और प्रणालीगत सुधार करने का प्रयास करेगा। यही दृष्टिकोण निरंतर सुधार (Continual Improvement) की गुणवत्ता संस्कृति को मजबूत बनाता है।
संपरीक्षा (Audit) के दौरान भी यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। कई बार छोटी प्रक्रिया विचलन (Minor Process Deviation) को केवल दोष खोजने का विषय बना दिया जाता है। जबकि विवेकपूर्ण नेतृत्व उसे सीखने और सुधार का अवसर मानता है। वह यह समझने का प्रयास करता है कि समस्या व्यक्ति में है या प्रणाली में।
विवेक से संचालित नेतृत्व प्रतिक्रिया देने से पहले ठहरता है। वह केवल नियमों के शब्द नहीं, बल्कि उनके पीछे के उद्देश्य को भी समझता है। वह निर्णयों का मूल्यांकन केवल कानूनी या प्रक्रियात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, मानवीय प्रभाव और संगठन के दीर्घकालिक हितों के आधार पर भी करता है। ऐसा नेतृत्व यह समझता है कि समझदारी का अर्थ प्राधिकार को कमजोर करना नहीं है, बल्कि उसका ईमानदारी और संतुलन के साथ उपयोग करना है।
संगठन केवल नियमों से नहीं चलते; वे विश्वास, निष्पक्षता और मानवीय संवेदनशीलता से आगे बढ़ते हैं। नियम व्यवस्था दे सकते हैं, लेकिन विवेक उस व्यवस्था को मानवीय बनाता है। ISO 9001 QMS मानक संगठनात्मक प्रक्रियाओं के लिए एक व्यवस्थित ढाँचा प्रदान करते हैं, परंतु उन प्रक्रियाओं में न्याय, संवेदनशीलता और संतुलन लाने का कार्य विवेकपूर्ण नेतृत्व ही करता है। अंततः, वही संगठन दीर्घकाल में अधिक विश्वसनीय और सम्मानित बनते हैं, जहाँ प्राधिकार केवल पद की शक्ति नहीं, बल्कि विवेक, नैतिकता और जिम्मेदारी से संचालित होता है।
सादर,
केशव राम सिंघल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें