ISO 9001 - प्रमाणपत्र लक्ष्य नहीं, संगठन-संस्कृति
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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe
एबीसी कंपनी (काल्पनिक नाम) के मैनेजिंग डायरेक्टर अशोक प्रधान (काल्पनिक नाम) पिछले कुछ दिनों से काफी परेशानी महसूस कर रहे थे। अंततः उन्होंने कंपनी के उच्च-अधिकारियों, प्लांट मैनेजर, यूनिट्स इंचार्जों की एक मीटिंग बुलाई, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में अपनी बात की शुरुआत करते हुए कहा — “हम ISO 9001 के कार्यान्वयन में असफल हो गए। इसलिए नहीं कि मानक में कोई कमी है या हमने उसे पढ़ा नहीं, बल्कि इसलिए कि हमने उसे नाटकीय ढंग से लागू किया।” सभी प्रतिभागियों को मैनेजिंग डायरेक्टर का कथन चौंकाने वाला लगा। मीटिंग में एक चुप्पी छा गई। सभी मन ही मन सोचने लगे। अशोक प्रधान ने संगठन की कड़वी सच्चाई लोगों के सामने बिना किसी राग लपेट के रख दी। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा - "हमने एक प्रतिष्ठित सलाहकार की सेवाएँ लीं। प्रक्रियाएँ बड़ी सावधानी से लिखी गईं। दस्तावेज़ आकर्षक थे, भाषा प्रभावशाली थी, संरचना व्यवस्थित थी। कागज़ों पर हमारी प्रबंध प्रणाली उत्कृष्ट दिखाई देती थी और उसी के आधार पर हमने ISO 9001 प्रमाणन भी प्राप्त कर लिया। हम खुश हो गए कि हम अब एक ISO 9001 प्रमाणन संगठन हैं। परंतु हम एक मूल प्रश्न भूल गए कि क्या हमारे संगठन के तय प्रक्रियाओं का वास्तविक अनुपालन हो रहा है? हमने यह जानने का प्रयास ही नहीं किया कि हमारी प्रणाली में वास्तविक कमियाँ क्या हैं। हमने आत्म-मूल्यांकन के बजाय संपरीक्षण (Audit) की तैयारी को प्राथमिकता दी। धीरे-धीरे हमारी ऊर्जा “प्रणाली सुधार” से हटकर “ऑडिट पास करने” में लग गई।"
किसी संगठन का सर्वोच्च नेतृत्व जब अपनी विफलता स्वीकार करता है, तब वह विफलता नहीं, परिवर्तन की शुरुआत होती है। अशोक प्रधान अपने संगठन के लोगों को आईना दिखा रहे थे और सभी चुपचाप उन्हें सुन रहे थे। आगे उन्होंने कहा, "परिणामस्वरूप हमारी ISO 9001 प्रबंध प्रणाली एक जीवंत प्रबंधन उपकरण के स्थान पर एक “दिखावे की वस्तु” बन गई— संपरीक्षकों के लिए दिखावा, ग्राहकों के लिए दिखावा, प्रमाणन संस्था के लिए दिखावा। और यह दिखावा करते हुए किसी प्रकार हमें प्रमाणपत्र मिल गया। पर क्या प्रमाणपत्र मिलने से हमारे संगठन का संचालन स्थिर और सुचारु हो गया? क्या प्रचालन समस्याएँ रुक गईं? क्या ग्राहक संतुष्ट हो गए? सच्चाई यह है कि हमारे संगठन का संचालन अभी भी नाजुक स्थिति में है। समस्याएँ दोहराई जा रही हैं। अधिकतर यूनिट्स की लीडरशिप अभी भी दैनिक संकटों में उलझी रहती है। ग्राहक असंगतता अनुभव करते हैं।"
जो कुछ अशोक प्रधान ने अपने साथियों से कहा उस सब में ISO 9001 के “दिखावटी अनुपालन” बनाम “वास्तविक कार्यान्वयन” की जो पीड़ा उभरकर आती है, वही आज अनेक संगठनों की सच्चाई है। अशोक प्रधान ने मूल समस्या को सही पकड़ा है — एबीसी कंपनी में प्रणाली बनाई गई, पर जी नहीं गई।
यदि हम वास्तविकता का विश्लेषण करें तो कुछ मूल प्रश्न हमारे सामने आते हैं। पहला प्रश्न, क्या संगठन की ISO 9001 प्रबंध प्रणाली संगठन के व्यापार को सुरक्षित कर रही है? यदि प्रणाली समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुँच रही, जोखिमों की पहचान नहीं कर रही, यदि सुधारात्मक कार्रवाई प्रभावी नहीं है, और नेतृत्व डेटा-आधारित निर्णय नहीं ले रहा, तो वह व्यापार को संरक्षित नहीं कर रही — केवल औपचारिकता निभा रही है। दूसरा प्रश्न, क्या ISO 9001 केवल प्रमाणन का उपकरण बन गया है? जब ऑडिट की तैयारी संस्था की प्राथमिकता बन जाए, दस्तावेज़ वास्तविक अभ्यास से अलग हो जाएँ, कर्मचारी प्रक्रियाओं को “अतिरिक्त बोझ” समझें, तब प्रणाली “सर्टिफिकेट प्राप्ति का साधन” बन जाती है, न कि “प्रबंधन का साधन”। हमें सोचना होगा कि वास्तविक अपेक्षाएँ क्या हैं? आखिर ISO 9001 का उद्देश्य है क्या? ISO 9001 एक दस्तावेज़ी प्रणाली नहीं, बल्कि प्रबंधन की कार्य-पद्धति है। यह ‘क्या लिखना है’ से अधिक ‘कैसे जीना है’ का मानक है।
हम इस स्थिति को कैसे सुधार सकते हैं? कुछ उपाय सामने हैं। पहला, नेतृत्व को सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। ISO 9001 केवल गुणवत्ता विभाग या किसी एक की जिम्मेदारी नहीं है। शीर्ष नेतृत्व सहित सभी को प्रणाली “जीनी” होगी। दूसरा, संगठन की प्रक्रियाओं का अनुपालन और मापन हो। लिखित प्रक्रिया तभी सार्थक है जब उसका पालन हो, उसके निष्पादन को मापा जाए, और विचलनों पर सुधार कार्यवाही हो। तीसरा, संगठन को जोखिम-आधारित सोच अपनानी होगी। समस्याओं के घटित होने की प्रतीक्षा नहीं — जोखिमों की पूर्व पहचान और निवारण के लिए काम करना होगा। चौथा, संगठन को आंतरिक संपरीक्षण का उद्देश्य बदलना होगा। यह समझना होगा कि संपरीक्षण का उद्देश्य “पकड़ना” नहीं, बल्कि “सुधार के अवसर खोजना” होना चाहिए। पाँचवाँ, संगठन में PDCA चक्र को जीवंत करना होगा। Plan–Do–Check–Act केवल दीवार पर लिखा न रहे, बल्कि दैनिक संचालन का हिस्सा बने। निष्कर्ष तौर पर हम कह सकते हैं कि ISO 9001 कभी भी गंतव्य नहीं है। यह प्रमाणपत्र पाने की मंजिल नहीं, बल्कि संचालन उत्कृष्टता की निरंतर यात्रा है।
प्रमाणपत्र एक परिणाम है। संगठन की सशक्त प्रबंध प्रणाली उसका कारण है। यदि संगठन कारण पर ध्यान देगा, परिणाम स्वयं आएगा। पर यदि संगठन केवल परिणाम (प्रमाणपत्र) पर केंद्रित रहेगा, तो प्रणाली दिखावे में बदल जाएगी। अंतिम विचार के तौर पर हम कह सकते हैं कि गुणवत्ता प्रणाली तब जीवंत होती है जब नेतृत्व प्रतिबद्ध हो, कर्मचारी सहभागी हों, प्रक्रियाएँ व्यवहार में हों, और सुधार निरंतर हो। अन्यथा ISO 9001 केवल दीवार पर टंगा एक प्रमाणपत्र रह जाता है। ISO 9001 प्रमाणपत्र पाना संगठन का लक्ष्य नहीं, बल्कि संगठन-संस्कृति को सुधारना संगठन का लक्ष्य होना चाहिए। ISO 9001 प्रणाली बनाना आसान है, पर उसे संगठन-संस्कृति बनाना कठिन है। गुणवत्ता प्रमाणपत्र से नहीं, व्यवहार से आती है।
ISO 9001 मात्र अनुपालन (Compliance) का नहीं, बल्कि प्रभावशीलता (Effectiveness) का मानक है। केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं कि कोई प्रक्रिया दस्तावेज़ों में मौजूद है; आवश्यक यह है कि वह व्यवहार में लागू हो और संगठन को मापनीय तथा सार्थक परिणाम दे रही हो।
सादर,
केशव राम सिंघल