सोमवार, 2 मार्च 2026

गुणवत्ता प्रबंधन पर एक जागरूकता कविता - गुणवत्ता संस्कृति

गुणवत्ता प्रबंधन पर एक जागरूकता कविता - 

गुणवत्ता संस्कृति 

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 


व्यवहार रूप में गुणवत्ता संस्कृति कैसे विकसित करें,

यह प्रश्न आज भी कई मनों को सालता है।

गुणवत्ता संस्कृति केवल नेतृत्व के आदेश से नहीं,

योजनाबद्ध और नेतृत्व-प्रेरित प्रयासों से विकसित होती है।


स्पष्ट गुणवत्ता दृष्टि और नीति निर्धारित करो, 

और व्यवहार रूप में इसे संगठन में उतारो, 

नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करो, 

मानक अपेक्षाओं को व्यवहार में लागू करो। 


अपेक्षाएँ केवल दस्तावेज़ीकरण तक सीमित न रहें, 

PDCA चक्र अपनाकर निरंतर सुधार को जीवन का हिस्सा बनाओ,

कर्मचारियों को बनाओ जागरूक और सशक्त, 

कर्मचारी-सुझाव योजना अपनाकर नवाचार को बढ़ाओ।


प्रशिक्षण-जागरूकता कार्यक्रम समय-समय पर आयोजित करो,

दोषारोपण के बजाय मूल कारण विश्लेषण पर ध्यान दो, 

गुणवत्ता लक्ष्यों को मापने योग्य बनाकर पारदर्शी समीक्षा करो, 

इन सतत प्रयासों से गुणवत्ता संस्कृति का दीप जलाओ।

 

सादर, 

केशव राम सिंघल 



गुणवत्ता संस्कृति, इसके तत्व और व्यवहार रूप में इसका संगठन में विकास

गुणवत्ता संस्कृति, इसके तत्व और व्यवहार रूप में इसका संगठन में विकास 

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 


एबीसी कंपनी (काल्पनिक नाम) के मैनेजिंग डायरेक्टर अशोक प्रधान (काल्पनिक नाम) इस बात से परेशान थे कि उनकी कंपनी वैसा परफॉर्म नहीं कर पा रही है, जैसे लक्ष्य निर्धारित किए गए। हालाँकि कंपनी को ISO 9001 प्रमाणन प्राप्त हो गया था, फिर भी वे सोचते थे कि उनके संगठन में गुणवत्ता संस्कृति कैसे विकसित की जाए। उन्हें लगा कि यदि मानक की अपेक्षाएँ व्यवहार में न उतारी जाएँ तो प्रमाणपत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।  पर असली बात तो उत्पाद या सेवाओं की गुणवत्ता को बढ़ाना है, जिसमें इनकी कंपनी फेल हो रही है। कंपनी के उत्पादों की गुणवत्ता के सम्बन्ध में बहुत सी शिकायते आ रही हैं, समय पर उत्पादन नहीं हो पा रहा है। उन्होंने मुझ से बात की और अपनी समस्या बताई। मैंने उन्हें कहा कि ऐसा लगता है कि आपके संगठन में गुणवत्ता संस्कृति के विकास के लिए कुछ प्रयासों की जरुरत है। यदि आप अपने कर्मचारियों को सही दिशा और मार्गदर्शन दोगे, तो उसके परिणाम बहुत ही सार्थक निकलेंगे। अशोक प्रधान ने मुझसे तीन मुख्य प्रश्न पूछे। पहला, गुणवत्ता संस्कृति से क्या तात्पर्य है? दूसरा, गुणवत्ता संस्कृति के मुख्य तत्व क्या हैं? तीसरा, हम अपने संगठन में गुणवत्ता संस्कृति किस प्रकार विकसित कर सकते हैं? अशोक प्रधान के तीनों ही प्रश्न बहुत ही सामयिक हैं और ये वो बातें हैं जिन्हें अधिकतर शीर्ष प्रबंधन के लोगों को जानना चाहिए।


गुणवत्ता संस्कृति 


गुणवत्ता संस्कृति (Quality Culture) से तात्पर्य उस सामूहिक सोच, व्यवहार, मूल्य और कार्यशैली से है जिसमें संगठन का प्रत्येक सदस्य गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। यह केवल नियमों या प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह संगठन की मानसिकता और दैनिक कार्यप्रणाली का हिस्सा बन जाती है, जिसमें लगातार सुधार के प्रति सभी प्रतिबद्ध और सतत प्रयत्नशील रहते हैं। गुणवत्ता संस्कृति वही विचार है जिसे W. Edwards Deming ने अपने सिद्धांतों में बल दिया था—कि गुणवत्ता केवल निरीक्षण से नहीं, बल्कि एक मजबूत प्रणाली और संस्कृति से आती है। गुणवत्ता संस्कृति कोई एक बार किया जाने वाला कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर यात्रा है। जब संगठन का प्रत्येक सदस्य “पहली बार में सही कार्य” (Do it Right First Time) की मानसिकता अपनाता है, तभी वास्तविक गुणवत्ता संस्कृति विकसित होती है। एक मजबूत गुणवत्ता संस्कृति संगठन को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है, साथ ही संगठन के लिए दीर्घकालिक सफलता और विश्वसनीयता भी सुनिश्चित करती है।


गुणवत्ता संस्कृति के मुख्य तत्व 


अब हम गुणवत्ता संस्कृति के मुख्य तत्वों की बात करते हैं। पहला तत्व है नेतृत्व की प्रतिबद्धता। शीर्ष प्रबंधन को स्वयं गुणवत्ता के प्रति समर्पित होना चाहिए और अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि संगठन के अन्य सदस्य भी उससे प्रेरणा ले सकें। शीर्ष नेतृत्व को गुणवत्ता जागरूकता कार्यक्रमों में रूचि लेनी चाहिए और प्रतिभागियों से बात करनी चाहिए कि उन्होंने क्या सीखा और कैसे वे अपनी सीख को उपयोग में लेंगे। शीर्ष प्रबंधन का एक मुख्य कार्य परिभाषित अंतराल पर गुणवत्ता प्रबंध प्रणाली की समीक्षा करना है। कई संगठनों में यह समीक्षा का कार्य गुणवत्ता विभाग के अधिकारियों को सौप दिया जाता है और शीर्ष प्रबंधन केवल समीक्षा रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर देते हैं। यदि समीक्षा में शीर्ष प्रबंधन रूचि लेता है तो इससे कर्मचारियों के बीच अच्छा सन्देश जाएगा। गुणवत्ता संस्कृति का दूसरा तत्व है ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण। संगठन के लोगों को ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। ग्राहक की अपेक्षाओं को समझना और उन्हें संतुष्ट करना संगठन के सभी लोगों का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। गुणवत्ता संस्कृति का तीसरा तत्व है निरंतर सुधार (Continual Improvement), जिसके लिए संगठन में सतत सुधार की मानसिकता होनी चाहिए। Toyota Motor Corporation में "काइज़ेन” (Kaizen) की संस्कृति थी। काइजेन संस्कृति से टोयोटा ने छोटे-छोटे सुधारों से बड़े परिणाम प्राप्त किए। गुणवत्ता संस्कृति का चौथा तत्व है प्रक्रिया-आधारित दृष्टिकोण, जिसके अंतर्गत कार्य व्यक्ति पर निर्भर न होकर, बल्कि सुव्यवस्थित प्रक्रियाओं पर आधारित हो। संगठन को अपनी प्रक्रियाओं को निरंतर सुधारने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। गुणवत्ता संस्कृति का पाँचवाँ तत्व है कर्मचारी सहभागिता, जिसके तहत हर कर्मचारी गुणवत्ता सुधार में अपनी भूमिका समझे और सुझाव देने के लिए प्रेरित हो। यह सुधार उत्पाद, सेवाओं और प्रक्रियाओं से सम्बंधित हो सकता है। गुणवत्ता संस्कृति का छठा तत्व प्रशिक्षण एवं विकास है। संगठन को कर्मचारियों के ज्ञान और कौशल बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण का आयोजन करना चाहिए। गुणवत्ता संस्कृति का सातवाँ तत्व डेटा-आधारित निर्णय है। संगठन में तथ्यों और आँकड़ों के आधार पर निर्णय लिए जाएँ। गुणवत्ता संस्कृति का आठवाँ तत्व खुला संवाद और पारदर्शिता है। संगठन में समस्याओं को छुपाने के बजाय खुलकर साझा करने और समाधान खोजने की संस्कृति होनी चाहिए। 


व्यवहार रूप में गुणवत्ता संस्कृति का विकास 


सैद्धांतिक चर्चा के बाद अब प्रश्न यह है कि इसे व्यवहार में कैसे उतारा जाए? गुणवत्ता संस्कृति का विकास किसी आदेश या निर्देश से नहीं होता; यह एक योजनाबद्ध, निरंतर और नेतृत्व-प्रेरित प्रक्रिया है। इसके लिए संगठन में निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए —


1. स्पष्ट गुणवत्ता दृष्टि और नीति निर्धारित करना


संगठन को एक स्पष्ट गुणवत्ता दृष्टि (Quality Vision) और नीति (Quality Policy) निर्धारित करनी चाहिए। यह नीति केवल दीवारों पर टंगी न रहे, बल्कि प्रत्येक कर्मचारी को समझ में आए और वह उसे अपने दैनिक कार्य में उतार सके। यह उत्तरदायित्व शीर्ष प्रबंधन को पूरा करना चाहिए। 


2. नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी


शीर्ष प्रबंधन को केवल समीक्षा बैठकों तक सीमित न रहकर गुणवत्ता अभियानों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सुधार परियोजनाओं में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। समय-समय पर शीर्ष प्रबंधन यदि कर्मचारियों से जुड़ता है तो संगठन में एक सकारात्मक सन्देश जाता है और गुणवत्ता संस्कृति में विकास होता है। गुणवत्ता गुरु W. Edwards Deming ने कहा था, प्रणाली को सुधारना नेतृत्व की जिम्मेदारी है। यदि नेतृत्व प्रतिबद्ध होगा, तो पूरा संगठन उसका अनुसरण करेगा।


3. ISO 9001 की अपेक्षाओं को व्यवहार में उतारना


यह ध्यान रखा जाए कि अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन International Organization for Standardization द्वारा विकसित ISO 9001 मानक केवल दस्तावेज़ीकरण तक सीमित न रहे। जो प्रक्रियाएँ निर्धारित की गई हैं, उन्हें वास्तव में लागू किया जाए, उनके निष्पादन को मापा जाए और सुधार के अवसर पहचान कर उचित कार्रवाई की जाए।


4. निरंतर सुधार की प्रणाली विकसित करना


संगठन को PDCA (Plan-Do-Check-Act) चक्र व्यवहार रूप में अपनाना चाहिए। छोटे-छोटे सुधारों को भी महत्व दिया जाए। “काइज़ेन” जैसी सोच अपनाकर निरंतर सुधार को दैनिक कार्य का हिस्सा बनाया जाए।


5. कर्मचारियों को सशक्त बनाना


कर्मचारियों को केवल निर्देश पालन करने वाला न समझकर, समस्या समाधानकर्ता के रूप में विकसित किया जाए। सुझाव योजना (Suggestion Scheme) लागू की जाए और अच्छे सुझावों को सम्मानित और पुरस्कृत किया जाए।


6. प्रशिक्षण और जागरूकता


गुणवत्ता संस्कृति के विकास के लिए नियमित प्रशिक्षण, कार्यशालाएँ और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ। कर्मचारियों को यह समझाया जाए कि उनका कार्य संगठन की समग्र गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करता है।


7. दोषारोपण के बजाय मूल कारण विश्लेषण


समस्याओं के समय दोषी व्यक्ति खोजने के बजाय “Root Cause Analysis” पर ध्यान दिया जाए कि समस्या कहाँ और क्यों घटित हुई। समस्या विश्लेषण के बाद उचित कार्रवाई की जाए। कर्मचारियों के लिए भयमुक्त वातावरण तैयार किया जाए। यदि कर्मचारी भयमुक्त वातावरण में कार्य करेंगे, तभी वे खुलकर समस्याएँ और उनके समाधान साझा करेंगे। संगठन को समस्याओं और गलतियों से सीखना चाहिए। 


8. प्रदर्शन मापन और पारदर्शिता


गुणवत्ता लक्ष्यों (Quality Objectives) को मापने योग्य बनाया जाए। डेटा आधारित समीक्षा हो और परिणामों को पारदर्शी रूप से साझा किया जाए।


सार 


गुणवत्ता संस्कृति का निर्माण एक दिन में नहीं होता। यह निरंतर प्रयास, सशक्त नेतृत्व और सामूहिक प्रतिबद्धता से विकसित होती है। जब संगठन के प्रत्येक सदस्य को यह अनुभव होने लगे कि गुणवत्ता केवल एक विभाग का कार्य नहीं, बल्कि उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है। ISO 9001 मानक अनुपालन का प्रमाणीकरण संगठन को पहचान दे सकता है, परंतु गुणवत्ता संस्कृति ही संगठन को गुणवत्ता यात्रा में सहायता करती है और प्रतिष्ठा दिलाती है।


सादर,

केशव राम सिंघल 


शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

ISO 9001 - प्रमाणपत्र लक्ष्य नहीं, संगठन-संस्कृति

ISO 9001 - प्रमाणपत्र लक्ष्य नहीं, संगठन-संस्कृति

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe

एबीसी कंपनी (काल्पनिक नाम) के मैनेजिंग डायरेक्टर अशोक प्रधान (काल्पनिक नाम) पिछले कुछ दिनों से काफी परेशानी महसूस कर रहे थे। अंततः उन्होंने कंपनी के उच्च-अधिकारियों, प्लांट मैनेजर, यूनिट्स इंचार्जों की एक मीटिंग बुलाई, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में अपनी बात की शुरुआत करते हुए कहा — “हम ISO 9001 के कार्यान्वयन में असफल हो गए। इसलिए नहीं कि मानक में कोई कमी है या हमने उसे पढ़ा नहीं, बल्कि इसलिए कि हमने उसे नाटकीय ढंग से लागू किया।” सभी प्रतिभागियों को मैनेजिंग डायरेक्टर का कथन चौंकाने वाला लगा। मीटिंग में एक चुप्पी छा गई। सभी मन ही मन सोचने लगे। अशोक प्रधान ने संगठन की कड़वी सच्चाई लोगों के सामने बिना किसी राग लपेट के रख दी। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा - "हमने एक प्रतिष्ठित सलाहकार की सेवाएँ लीं। प्रक्रियाएँ बड़ी सावधानी से लिखी गईं। दस्तावेज़ आकर्षक थे, भाषा प्रभावशाली थी, संरचना व्यवस्थित थी। कागज़ों पर हमारी प्रबंध प्रणाली उत्कृष्ट दिखाई देती थी और उसी के आधार पर हमने ISO 9001 प्रमाणन भी प्राप्त कर लिया। हम खुश हो गए कि हम अब एक ISO 9001 प्रमाणन संगठन हैं। परंतु हम एक मूल प्रश्न भूल गए कि क्या हमारे संगठन के तय प्रक्रियाओं का वास्तविक अनुपालन हो रहा है? हमने यह जानने का प्रयास ही नहीं किया कि हमारी प्रणाली में वास्तविक कमियाँ क्या हैं। हमने आत्म-मूल्यांकन के बजाय संपरीक्षण (Audit) की तैयारी को प्राथमिकता दी। धीरे-धीरे हमारी ऊर्जा “प्रणाली सुधार” से हटकर “ऑडिट पास करने” में लग गई।" 


किसी संगठन का सर्वोच्च नेतृत्व जब अपनी विफलता स्वीकार करता है, तब वह विफलता नहीं, परिवर्तन की शुरुआत होती है। अशोक प्रधान अपने संगठन के लोगों को आईना दिखा रहे थे और सभी चुपचाप उन्हें सुन रहे थे। आगे उन्होंने कहा, "परिणामस्वरूप हमारी ISO 9001 प्रबंध प्रणाली एक जीवंत प्रबंधन उपकरण के स्थान पर एक “दिखावे की वस्तु” बन गई— संपरीक्षकों के लिए दिखावा, ग्राहकों के लिए दिखावा, प्रमाणन संस्था के लिए दिखावा। और यह दिखावा करते हुए किसी प्रकार हमें प्रमाणपत्र मिल गया। पर क्या प्रमाणपत्र मिलने से हमारे संगठन का संचालन स्थिर और सुचारु हो गया? क्या प्रचालन समस्याएँ रुक गईं? क्या ग्राहक संतुष्ट हो गए? सच्चाई यह है कि हमारे संगठन का संचालन अभी भी नाजुक स्थिति में है। समस्याएँ दोहराई जा रही हैं। अधिकतर यूनिट्स की लीडरशिप अभी भी दैनिक संकटों में उलझी रहती है। ग्राहक असंगतता अनुभव करते हैं।"


जो कुछ अशोक प्रधान ने अपने साथियों से कहा उस सब में ISO 9001 के “दिखावटी अनुपालन” बनाम “वास्तविक कार्यान्वयन” की जो पीड़ा उभरकर आती है, वही आज अनेक संगठनों की सच्चाई है। अशोक प्रधान ने मूल समस्या को सही पकड़ा है — एबीसी कंपनी में प्रणाली बनाई गई, पर जी नहीं गई।


यदि हम वास्तविकता का विश्लेषण करें तो कुछ मूल प्रश्न हमारे सामने आते हैं। पहला प्रश्न, क्या संगठन की ISO 9001 प्रबंध प्रणाली संगठन के व्यापार को सुरक्षित कर रही है? यदि प्रणाली समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुँच रही, जोखिमों की पहचान नहीं कर रही, यदि सुधारात्मक कार्रवाई प्रभावी नहीं है, और नेतृत्व डेटा-आधारित निर्णय नहीं ले रहा, तो वह व्यापार को संरक्षित नहीं कर रही — केवल औपचारिकता निभा रही है। दूसरा प्रश्न, क्या ISO 9001 केवल प्रमाणन का उपकरण बन गया है? जब ऑडिट की तैयारी संस्था की प्राथमिकता बन जाए, दस्तावेज़ वास्तविक अभ्यास से अलग हो जाएँ, कर्मचारी प्रक्रियाओं को “अतिरिक्त बोझ” समझें, तब प्रणाली “सर्टिफिकेट प्राप्ति का साधन” बन जाती है, न कि “प्रबंधन का साधन”। हमें सोचना होगा कि वास्तविक अपेक्षाएँ क्या हैं? आखिर ISO 9001 का उद्देश्य है क्या? ISO 9001 एक दस्तावेज़ी प्रणाली नहीं, बल्कि प्रबंधन की कार्य-पद्धति है। यह ‘क्या लिखना है’ से अधिक ‘कैसे जीना है’ का मानक है।


हम इस स्थिति को कैसे सुधार सकते हैं? कुछ उपाय सामने हैं। पहला, नेतृत्व को सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। ISO 9001 केवल गुणवत्ता विभाग या किसी एक की जिम्मेदारी नहीं है। शीर्ष नेतृत्व सहित सभी को प्रणाली “जीनी” होगी। दूसरा, संगठन की प्रक्रियाओं का अनुपालन और मापन हो। लिखित प्रक्रिया तभी सार्थक है जब उसका पालन हो, उसके निष्पादन को मापा जाए, और विचलनों पर सुधार कार्यवाही हो। तीसरा, संगठन को जोखिम-आधारित सोच अपनानी होगी। समस्याओं के घटित होने की प्रतीक्षा नहीं — जोखिमों की पूर्व पहचान और निवारण के लिए काम करना होगा। चौथा, संगठन को आंतरिक संपरीक्षण का उद्देश्य बदलना होगा। यह समझना होगा कि संपरीक्षण का उद्देश्य “पकड़ना” नहीं, बल्कि “सुधार के अवसर खोजना” होना चाहिए। पाँचवाँ, संगठन में PDCA चक्र को जीवंत करना होगा। Plan–Do–Check–Act केवल दीवार पर लिखा न रहे, बल्कि दैनिक संचालन का हिस्सा बने। निष्कर्ष तौर पर हम कह सकते हैं कि ISO 9001 कभी भी गंतव्य नहीं है। यह प्रमाणपत्र पाने की मंजिल नहीं, बल्कि संचालन उत्कृष्टता की निरंतर यात्रा है। 


प्रमाणपत्र एक परिणाम है। संगठन की सशक्त प्रबंध प्रणाली उसका कारण है। यदि संगठन कारण पर ध्यान देगा, परिणाम स्वयं आएगा। पर यदि संगठन केवल परिणाम (प्रमाणपत्र) पर केंद्रित रहेगा, तो प्रणाली दिखावे में बदल जाएगी। अंतिम विचार के तौर पर हम कह सकते हैं कि गुणवत्ता प्रणाली तब जीवंत होती है जब नेतृत्व प्रतिबद्ध हो, कर्मचारी सहभागी हों, प्रक्रियाएँ व्यवहार में हों, और सुधार निरंतर हो। अन्यथा ISO 9001 केवल दीवार पर टंगा एक प्रमाणपत्र रह जाता है। ISO 9001 प्रमाणपत्र पाना संगठन का लक्ष्य नहीं, बल्कि संगठन-संस्कृति को सुधारना संगठन का लक्ष्य होना चाहिए। ISO 9001 प्रणाली बनाना आसान है, पर उसे संगठन-संस्कृति बनाना कठिन है। गुणवत्ता प्रमाणपत्र से नहीं, व्यवहार से आती है। 


ISO 9001 मात्र अनुपालन (Compliance) का नहीं, बल्कि प्रभावशीलता (Effectiveness) का मानक है। केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं कि कोई प्रक्रिया दस्तावेज़ों में मौजूद है; आवश्यक यह है कि वह व्यवहार में लागू हो और संगठन को मापनीय तथा सार्थक परिणाम दे रही हो।


सादर, 

केशव राम सिंघल 

 

 

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

गुणवत्ता के लिए उच्च-प्रबंधन की भूमिका

 गुणवत्ता के लिए उच्च-प्रबंधन की भूमिका 

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

गुणवत्ता केवल दस्तावेज़ों का विषय नहीं है — यह नेतृत्व की सोच और प्रतिबद्धता से प्रारंभ होती है। ग्यारह ऐसे कार्य जिन पर उच्च-प्रबंधन को विशेष ध्यान देना चाहिए - 


1. स्पष्ट गुणवत्ता नीति और उद्देश्य निर्धारित करना 

   संगठन की दिशा स्पष्ट हो। गुणवत्ता नीति व्यावहारिक, मापनीय तथा व्यवसायिक लक्ष्यों से जुड़ी हो।


2. नेतृत्व द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करना

   केवल निर्देश देने से नहीं, बल्कि व्यवहार से गुणवत्ता संस्कृति विकसित होती है। जैसा कि W. Edwards Deming ने कहा था – “A bad system will beat a good person every time.” 


   उच्च-प्रबंधन को गुणवत्ता के प्रति व्यवहारिक रूप से स्वयं रुचि लेकर ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, जिससे एक सुदृढ़ प्रणाली विकसित हो और प्रत्येक कर्मचारी उसे कार्यान्वित करने के लिए प्रेरित हो।


   उदाहरण के तौर पर, हमने देखा है कि अनेक संगठनों में आंतरिक संपरीक्षण (Internal Audit) के दौरान उच्च-प्रबंधन का संपरीक्षण नहीं किया जाता। नेतृत्व को स्वयं आंतरिक संपरीक्षण टीम को निर्देश देना चाहिए कि वे उनका भी संपरीक्षण करें और उनकी कमियों को इंगित करें, ताकि उनमें भी सुधार किया जा सके। यही वास्तविक नेतृत्व है।


3. ग्राहक की आवाज़ (Voice of Customer) को प्राथमिकता देना 

   ग्राहक संतुष्टि, शिकायतों का विश्लेषण तथा प्राप्त फीडबैक को रणनीतिक निर्णयों में सम्मिलित करना।


4. जोखिम-आधारित सोच (Risk-Based Thinking) अपनाना

   संभावित जोखिमों एवं अवसरों की पहचान कर समय रहते निवारक और सुधारात्मक कदम उठाना।


5. सक्षम एवं प्रशिक्षित मानव संसाधन विकसित करना

   नियमित प्रशिक्षण, कौशल-विकास और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से कर्मचारियों को सशक्त बनाना।


6. प्रक्रियाओं का मानकीकरण एवं निरंतर सुधार

   PDCA (Plan-Do-Check-Act) चक्र के प्रभावी कार्यान्वयन पर ध्यान देकर निरंतर सुधार की संस्कृति को बढ़ावा देना। मानकीकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्था आईएसओ (ISO - International Organization for Standardization) द्वारा प्रकाशित ISO 9001:2015 भी निरंतर सुधार (Continual Improvement) पर विशेष बल देता है।


7. पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना 

   उपयुक्त मानव संसाधन, अवसंरचना, आधुनिक तकनीक तथा सटीक मापन उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना। यह ऐसा क्षेत्र है, जहाँ नेतृत्व की स्वीकृति और सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक होती है।


8. डेटा-आधारित निर्णय लेना 

   निर्णय तथ्यों, विश्लेषण तथा प्रमाणित आँकड़ों के आधार पर लिए जाएँ, न कि केवल अनुभव या अनुमान के आधार पर।


9. प्रभावी आंतरिक संचार प्रणाली विकसित करना 

   गुणवत्ता लक्ष्यों, परिवर्तित कार्यविधियों, उपलब्धियों और चुनौतियों की जानकारी संगठन के प्रत्येक स्तर तक स्पष्ट रूप से पहुँचे।


10. निष्पादन (Performance) की नियमित समीक्षा (Management Review)

    नियमित प्रबंधन समीक्षा बैठकों में गुणवत्ता उद्देश्यों, मुख्य निष्पादन संकेतकों (KPIs), ऑडिट परिणामों तथा सुधारात्मक कार्यों की समग्र समीक्षा करना।


11. गुणवत्ता संस्कृति (Quality Culture) को बढ़ावा देना 

    दोषारोपण (Blame Culture) के स्थान पर सीखने और सुधार की संस्कृति विकसित करना। कर्मचारियों को सुझाव देने, नवाचार करने और उत्तरदायित्व लेने के लिए प्रोत्साहित करना।


सार 


यदि उच्च-प्रबंधन जागरूक, प्रतिबद्ध और सक्रिय रहता है, तो पूरा संगठन गुणवत्ता के प्रति जागरूक हो जाता है। गुणवत्ता केवल किसी एक विभाग का उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि नेतृत्व की प्रतिबद्धता का प्रत्यक्ष परिणाम होती है।


सादर, 

केशव राम सिंघल 



गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

शीर्ष प्रबंधन की सोच और गुणवत्ता के प्रति दृष्टिकोण

शीर्ष प्रबंधन की सोच और गुणवत्ता के प्रति दृष्टिकोण 

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एक दिन मुझे दो कंपनियों को देखने तथा उनके शीर्ष प्रबंधन से मिलने का अवसर मिला।


जब मैं पहली कंपनी में पहुँचा, तो मुझे बताया गया कि यह कंपनी ISO 9001:2015 प्रमाणित है। एक शीर्ष प्रबंधक के चैंबर में ISO प्रमाणन का प्रमाणपत्र दीवार पर टंगा हुआ भी दिखाई दिया। मैंने उनकी उत्पादन इकाइयों (Manufacturing Units) का दौरा किया। वहाँ मैंने देखा कि सुपरवाइजर्स (Supervisors) ऑपरेटर्स (Operators) की अत्यंत सतर्कता से निगरानी कर रहे थे। इंस्पेक्टर्स (Inspectors) तैयार माल (Finished Goods) की जाँच कर रहे थे। जैसे ही कोई कमी (Defect) पाई जाती, उस नॉन-कन्फॉर्मिंग उत्पाद (Nonconforming Product) को अलग कर दिया जाता। ऑपरेटर्स को चेतावनी (Warning) दी जाती तथा अच्छी तरह काम करने का दबाव डाला जाता। उत्पादन इकाई की दीवारों पर लक्ष्य स्पष्ट रूप से प्रदर्शित थे। उत्पादन तो हो रहा था, परंतु वातावरण में तनावपूर्ण खामोशी और दबाव का अनुभव हुआ।


इसके बाद मैं दूसरी कंपनी में गया। वहाँ शीर्ष प्रबंधन ने बताया कि उन्होंने अभी तक ISO मानकों के अनुपालन का कोई प्रमाणन (Certification) नहीं लिया है। हालाँकि वे ISO 9001:2015 तथा ISO 14001:2015 को कार्यान्वित करने की योजना बना रहे हैं और इसके लिए कुछ कर्मचारियों को प्रशिक्षण हेतु भेजा गया है। जब मैंने उनकी उत्पादन इकाइयों का निरीक्षण किया, तो पाया कि इस कंपनी में प्रक्रियाएँ (Processes) अत्यंत स्पष्ट रूप से परिभाषित थीं। दीवारों पर कार्य निर्देश (Work Instructions) लिखे हुए थे। समस्याओं पर खुले रूप से चर्चा हो रही थी और ऑपरेटर्स से सुझाव माँगे जा रहे थे कि प्रक्रिया को कैसे और बेहतर बनाया जा सकता है। यहाँ मुख्य ध्यान इस बात पर था कि प्रक्रियाएँ सही ढंग से चलें और यदि कोई कमी हो तो उसे पहचानकर सुधार किया जाए। जब मैंने यहाँ नॉन-कन्फॉर्मिंग उत्पादों के बारे में जानकारी माँगी, तो बताया गया कि प्रक्रियाओं की निरंतर निगरानी और सुधार के कारण यहाँ ऐसे उत्पाद बहुत कम होते हैं। और यदि कभी कोई नॉन-कन्फॉर्मिंग उत्पाद बन भी जाता है, तो ऑपरेटर्स और टीम मिलकर यह विचार करती है कि प्रक्रिया में कौन-सी कमी रही और उसे कैसे दूर किया जाए। इस कंपनी का वातावरण शांत, सकारात्मक और सहयोगपूर्ण लगा। यहाँ तनाव या भय का अनुभव नहीं हुआ।


मेरी राय में पहली कंपनी अधिक तनावग्रस्त और रक्षात्मक (Defensive) प्रतीत हुई, जबकि दूसरी कंपनी शांत, स्थिर (Stable) और सुधार-उन्मुख दिखाई दी। मुझे लगता है कि इन दोनों कंपनियों के बीच वास्तविक अंतर उनके शीर्ष प्रबंधन की सोच और गुणवत्ता के प्रति दृष्टिकोण में है। जहाँ पहली कंपनी प्रमाणन को लक्ष्य मानकर चल रही थी, वहीं दूसरी कंपनी लगातार सुधार (Continual Improvement) को गुणवत्ता संस्कृति (Quality Culture) बनाकर आगे बढ़ रही थी।


अनुभव आधारित सीख - प्रमाणन से अधिक महत्वपूर्ण है गुणवत्ता संस्कृति और लगातार सुधार।


सादर,

केशव राम सिंघल


मंगलवार, 13 जनवरी 2026

गुणवत्ता प्रबंधन (Quality Management) में सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) एक सहायक उपकरण — जोखिम-आधारित सोच के साथ एक संतुलित गुणवत्ता सुधार दृष्टिकोण

 गुणवत्ता प्रबंधन (Quality Management) में सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) एक सहायक उपकरण

— जोखिम-आधारित सोच के साथ एक संतुलित गुणवत्ता सुधार दृष्टिकोण

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

मैं पिछले दिनों डॉ दिव्या सिंघल और क्रिस्टल फेर्रो की किंडल किताब 'Business for Good in Action - Celebrating AIM2Flourish Stories Through Appreciative Inquiry' पढ़ रहा था तो मेरे मन में यह विचार आया कि सराहनात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) किस तरह गुणवत्ता प्रबंधन के लिए सहायक हो सकता है। मैंने जाना कि सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) एक सकारात्मक और सहभागी दृष्टिकोण है, जिसका उपयोग संगठन अपने विकास, परिवर्तन प्रबंधन (Change Management), टीम बनाने (Building Team) और अपने लोगों के व्यक्तिगत विकास के लिए करते हैं। यह समस्या-केंद्रित सोच (Problem-Focused Thinking) के बजाय सफलताओं, शक्तियों और संभावनाओं पर ध्यान देता है। यह अवधारणा डॉ. डेविड कूपरराइडर, जो Case Western Reserve University (USA) से संबद्ध रहे, ने 1980 के दशक में विकसित की और यह सिद्धांत उनके डॉक्टरेट शोध (PhD Dissertation) से निकला। 


सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) का मूल विचार "समस्याओं को सुधारने के बजाय, जो अच्छा है उसे और बेहतर बनाया जाए" है। संक्षेप में चर्चा करें तो हम पाते हैं कि सराहात्मक अन्वेषण दृष्टिकोण के पाँच सिद्धांत हैं - (1) सकारात्मकता  (Positivity) - सकारात्मक प्रश्न सकारात्मक ऊर्जा और समाधान उत्पन्न करते हैं। (2) निर्माणवादी (Constructivist) - हमारी बातचीत और भाषा हमारी वास्तविकता का निर्माण करती है। (3) समानांतरता (Simultaneity) - प्रश्न पूछते ही परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। (4) काव्यात्मकता (poeticism) - संगठन एक खुली किताब की तरह है—जिस अध्याय पर ध्यान देंगे, वही बढ़ेगा। (5) भविष्य दृष्टि - प्रत्याशित (Anticipatory) - भविष्य की सकारात्मक कल्पना वर्तमान कार्यों को दिशा देती है। 


जब भी संगठन में सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) दृष्टिकोण काम में लाया जाता है तो उससे अनेक लाभ मिलते हैं। कर्मचारियों की भागीदारी (Involvement) और प्रेरणा (Motivation) बढ़ती है। नवाचार (Innovation) और रचनात्मकता (Creativity) को प्रोत्साहन मिलता है। सकारात्मक संगठनात्मक संस्कृति बनती है। परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध कम होता है। नेतृत्व और टीमवर्क मजबूत होता है। 


पारंपरिक तौर से हम अपने संगठन में प्रश्न पूछते हैं - “हमारी प्रक्रिया में क्या गलत है?” जबकि सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) दृष्टिकोण अपनाने पर हम प्रश्न पूछते हैं - “कब हमारी प्रक्रिया सबसे अच्छी तरह काम करती है और क्यों?” इस प्रकार हम पाते हैं कि सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) एक ऐसी सोच है जो कमियों पर नहीं, क्षमताओं पर आधारित होती है। यह गुणवत्ता, लीन, नवाचार, नेतृत्व और सतत सुधार की दिशा में अत्यंत प्रभावी दृष्टिकोण है। 


हालाँकि सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) लगातार सुधार की दिशा में प्रभावी दृष्टिकोण है, पर मेरे मन में यह विचार आया कि यह कमियों को नजरंदाज कर सकता है और इस प्रकार शायद यह सोच गुणवत्ता प्रबंधन के लिए लाभदायक न हो। वास्तव में गुणवत्ता प्रबंधन  (Quality Management) में सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) तभी प्रभावी सिद्ध होती है जब उसका सही ढंग से उपयोग किया जाए। गुणवत्ता प्रबंधन में सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) के अनेक लाभ हैं, जिनकी मैं चर्चा करना चाहूँगा। 


(1) सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) सकारात्मक गुणवत्ता संस्कृति के निर्माण में सहायक है। गुणवत्ता (Quality) केवल प्रक्रियाओं से नहीं, लोगों के दृष्टिकोण से आती है। सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) दोष खोजने की संस्कृति से हटाकर सीखने और सुधार की संस्कृति विकसित करती है। इससे भयमुक्त रिपोर्टिंग (Fear-free Reporting), सुझाव प्रणाली और सहभागिता बढ़ती है।


(2) सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) की पहचान और विस्तार में सहायक है। पारंपरिक आतंरिक संपरीक्षण (Internal Audit) में हम पता लगाते हैं कि गैर-अनुरूपता (Nonconformity) कहाँ हैं? सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) यह पता लगाता है कि कहाँ प्रक्रिया ने सर्वोत्तम परिणाम दिए? क्यों? गुणवत्ता प्रबंधन के लिए दोहराए जाने योग्य सर्वोत्तम प्रथाओं (Repeatable Best Practices) को पहचानने में सहायक है। साथ ही यह मानकीकरण और बेंचमार्किंग (Standardization and Benchmarking को सशक्त बनाता है।


(3) सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) लगातार सुधार (Continual Improvement को ऊर्जा देती है। आईएसओ 9001 गुणवत्ता प्रबंध प्रणाली में लगातार सुधार (Continual Improvement) अपेक्षा (Requirement) है। इस प्रकार सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) सुधार को सुधारात्मक बोझ (Corrective Burden) नहीं, विकास का अवसर (Growth opportunity) देती है। कर्मचारी सुधार गतिविधियों में स्वेच्छा से जुड़ते हैं।


(4) सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) नेतृत्व (Leadership) और टीम की संलग्नता (Engagement of Team) में सहायक है। यह कर्मचारियों को समस्या स्रोत (Problem source) नहीं, समाधान भागीदार (Solution partner) मानती है। इससे कर्मचारियों में स्वामित्व (Ownership) की भावना बढ़ती है और संगठन में क्रॉस-फ़ंक्शनल गुणवत्ता सुधार (Cross-functional Quality Improvement ) संभव होता है। 


(5) सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) परिवर्तन प्रबंधन (Change Management) में सहायक है। नए गुणवत्ता पहलों (Quality Initiatives) में यह प्रतिरोध (Resistance) कम करती है और बदलाव को सफल अनुभवों की निरंतरता के रूप में प्रस्तुत करती है। 


इतना सब कुछ समझने के बाद आपकी चिंता यह हो सकती है कि सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) कमियों को नजरअंदाज कर सकता है। हाँ, यदि इसे गलत समझा जाए। यह इस दृष्टिकोण की कमजोरी नहीं, गलत उपयोग का जोखिम है। इस दृष्टिकोण के अपनाने के संभावित जोखिम के तहत महत्वपूर्ण असंगतियाँ महत्वपूर्ण गैर-अनुरूपता (Critical Nonconformity) अनदेखी रह सकती है, मूल कारण विश्लेषण (Root Cause Analysis) कमजोर पड़ सकता है, नियामक (Regulatory) और ग्राहक (Customer) अपेक्षाओं (Requirements) की पालना में कमी रह सकती है। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) को अकेले इस्तेमाल करना खतरनाक हो सकता है। इसलिए समाधान यह है कि सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) और जोखिम आधारित सोच (Risk-based Thinking) को एक साथ अपनाकर संतुलित गुणवत्ता सुधार मॉडल (Balanced Quality Improvement Model) बनाया जाए। आईएसओ 9001:2015 मानक में भी जोखिम आधारित सोच (Risk-based thinking) एक अपेक्षा (Requirement) है। इसलिए सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) को इस तरह प्रयोग करना चाहिए कि सकारात्मक फ्रेमिंग (Positive Framing) के साथ अंतर विश्लेषण (Gap Analysis) किया जाए। उदाहरण के लिए, यहाँ क्या गलत है? कब यह प्रक्रिया बिना दोष के चली और क्यों? फिर उसी से अंतर (Gap) और जोखिम (Risk) पहचान सकते हैं। 


सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) को पीडीसीए चक्र (PDCA Cycle) में समाहित किया जा सकता है। पी अर्थात आयोजना (Plan) के अंतर्गत ताकत, सफल अनुभव और अवसर देखें, डी के अंतर्गत प्रेरित क्रियान्वयन करें, सी के अंतर्गत आंकड़े जाँचे, संपरीक्षण करें और अपालना चेक करें और ए के अंतर्गत सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) आधारित सुधार और मानकीकरण करें।  सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) का अर्थ यह नहीं है कि गैर-अनुरूपताओं (Nonconformities) का पता न लगाया जाए बल्कि संपरीक्षण निष्कर्ष (Audit Findings) को सीखने के अवसर के रूप में लिया जाए और दोषमुक्त (Blamefree) मूल कारण विश्लेषण (Root Cause Analysis) किया जाए। 


यदि हम गुणवत्ता प्रबंधन में सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) का सही स्थान खोजें तो पाते हैं कि यह संस्कृति निर्माण (Culture building), कर्मचारी सहभागिता (Employee engagement), उत्कर्ष प्रथाओं को साझा करने (Best practice sharing), नवाचार और निरंतर सुधार (Innovation and Continual Improvement) के लिए अत्यंत प्रभावी है। साथ ही हम यह भी पाते हैं कि सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) की भूमिका विनियामक अनुपालन (Regulatory compliance), सुरक्षा सम्बंधित प्रक्रियाओं (Safety-critical processes), कानूनी और वैधानिक अंतराल (Legal and statutory gaps) तथा गंभीर गैर-अनुरूपता से निपटना (Serious Nonconformity handling) के लिए सीमित है। हमें यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) गुणवत्ता प्रबंधन (Quality Management) के लिए अत्यंत उपयोगी है, लेकिन यह दोष पहचान (Defect Identification) का विकल्प नहीं है। इसके लिए सही दृष्टिकोण यही होगा कि कामों को सुधारने के लिए समस्या देखे, सुधार करें और सुधार को टिकाऊ बनाने के लिए शक्तियों को पहचाने।  


सार


सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) गुणवत्ता प्रबंधन (Quality Management) को मानवीय, सहभागी और प्रेरणादायी बनाता है। यह दोष पहचान का विकल्प नहीं, बल्कि उसे संतुलित और टिकाऊ सुधार में बदलने का माध्यम है। जोखिम-आधारित सोच और पीडीसीए चक्र के साथ इसका समन्वय संगठन को सीखने वाली संस्था (Learning Organization) की ओर ले जाता है। सही उपयोग के साथ सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) गुणवत्ता संस्कृति, नवाचार और निरंतर सुधार का सशक्त आधार बन सकता है।


सादर,

केशव राम सिंघल 

अगला लेख - गुणवत्ता प्रबंधन (Quality Management) में सराहात्मक अन्वेषण (Appreciative Inquiry) लागू करने के लिए चरण-दर-चरण (Step-by-Step) कार्यान्वयन मॉडल 


गुरुवार, 8 जनवरी 2026

आंतरिक संपरीक्षण (Internal Audit): सिर्फ अनुपालन की औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रारंभिक चेतावनी तंत्र है

आंतरिक संपरीक्षण (Internal Audit) - सिर्फ अनुपालन की औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रारंभिक चेतावनी तंत्र है

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चित्र साभार NightCafe 

ज्यादातर संगठनों में आंतरिक संपरीक्षण (Internal Audit) को “कर लिया-भूल गए” जैसा काम समझा जाता है। गुणवत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग सोचते हैं कि निर्धारित तारीख पर संपरीक्षण कर लो, जांच-सूची से प्रश्न पूछ लो, कुछ गैर-अनुरूपताएँ (Nonconformities) या अपालनाएँ (noncompliances) ढूंढो, उन्हें सामने लाओ और उन्हें सुधार कर मानक के अनुरूप ठीक कर दो। अंत में रिपोर्ट बनाओ, उसे फाइल कर दो ताकि जब प्रमाणन संपरीक्षण हो तो प्रमाणन संस्था के संपरीक्षकों (auditors) को बताया जा सके कि नियत समय पर आंतरिक संपरीक्षण हुआ, ताकि प्रमाणन (certification) बरकरार रहे और काम खत्म।


यह सोच गलत है और मानक की मूल भावना के विरुद्ध है। आईएसओ 9001:2015 मानक के खंड 9.2 में स्पष्ट लिखा है कि आंतरिक संपरीक्षण का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि संगठन में गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (QMS) मानक की अपेक्षाओं (requirements) के अनुरूप है, और प्रभावी ढंग से कार्यान्वित (implemented) और पोषित (maintained) है।


मानक की अपेक्षाओं को “प्रभावी ढंग से” कार्यान्वित करना ज्यादातर संगठन भूल जाते हैं। जबकि परिपक्व संगठनों में आंतरिक संपरीक्षण प्रारंभिक चेतावनी रडार (Early Warning Radar) की तरह काम करता है। यह आपको बताता है कि कहीं प्रक्रिया चुपचाप खराब या क्षीण तो नहीं हो रही, इससे पहले कि ग्राहक शिकायत करे, नियामक नोटिस भेजे या बड़ा नुकसान हो जाए।


जब संपरीक्षण केवल “अनुपालन टिक-मार्क” (Compliance tick mark) बन जाता है, तो गैर-अनुरूपताएँ (nonconformities) या अपालनाएँ    (noncompliances) सतही ठीक हो जाती हैं, लेकिन मूल कारण नहीं हटता। जोखिम (risks) छिपे रहते हैं, सुधार के अवसर खो जाते हैं और नेतृत्व को लगता है “सब ठीक है”, जबकि जमीनी हकीकत अलग होती है।


उत्कृष्ट संगठन अलग तरह से संपरीक्षण करते हैं। जोखिम आधारित सोच (रिस्क-बेस्ड थिंकिंग) के तहत वे इन सवालों पर केंद्रित (focus) करते हैं -


(1) यह प्रक्रिया अभी तो चल रही है, लेकिन दबाव (उच्च मांग, कर्मचारी कमी, सप्लायर देरी) में क्या यह प्रक्रिया टिकेगी?


(2) कौन से नियंत्रण केवल दस्तावेजों में हैं, जमीन पर नहीं?


(3) कौन से “जुगाड़” (workarounds) अब स्थायी प्रक्रिया बन गए हैं?


(4) कौन से जोखिम बढ़ रहे हैं, पर अभी मुख्य निष्पादन संकेतक (KPI) में नहीं दिख रहे?


मैं कुछ वास्तविक उदाहरणों की चर्चा करना चाहूंगा।


(1) एक उत्पादन कंपनी (manufacturing company) में मशीन रखरखाव की प्रक्रिया लिखित थी, पर कर्मचारी “तुरंत उत्पादन” के चक्कर में निवारक रखरखाव (preventive maintenance) पर ध्यान नहीं देते थे। अनुपालन संपरीक्षण में सब “ठीक है” दिखता था। जोखिम-आधारित संपरीक्षण (risk based audit) में संपरीक्षक (auditor) ने पिछले 6 महीने के टूट-फूट लॉग (breakdown log) की जाँच की, जिससे पता चला  कि 70 % टूट-फूट (breakdown) अनियोजित (unplanned) थे। सुधार के बाद डाउनटाइम (downtime) 40 % कम हुआ, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ी। 


(2) एक सर्विस कंपनी (BPO) के कॉल सेंटर में “कॉल रिकॉर्डिंग रिव्यू” प्रक्रिया थी। चेकलिस्ट में टिक मार्क लग जाता था। जब संपरीक्षक (auditor) ने अचानक कॉल्स (random calls) सुनीं, तो पता चला प्रतिनिधि स्क्रिप्ट की पालना नहीं कर रहे और ग्राहक डेटा के रिसाव (customer data leak) का जोखिम था। मुख्य निष्पादन संकेतक (KPI - AHT, CSAT) तो अच्छे थे, पर जोखिम छिपा था। सुधार के बाद डेटा सुरक्षा में 25% सुधार हुआ।


(3) एक फार्मा कंपनी के पैकेजिंग विभाग में दृश्य निरीक्षण प्रक्रिया (visual inspection process) थी। प्रशिक्षण अभिलेख (training record) पूरे थे। संपरीक्षक (auditor) ने लाइन पर 15 मिनट खड़े होकर देखा तो पता चला प्रकाश (lighting) कम था और कर्मचारी 12 घंटे की शिफ्ट में थकान से गलतियाँ कर रहे थे। यह बात मुख्य निष्पादन संकेतक (KPI) में नहीं दिख रही थी, पर वापिस बुलाने (recall) का बड़ा जोखिम था। सुधार (बेहतर लाइटिंग और शिफ्ट रोटेशन) से त्रुटि दर 30% घटी।


निष्कर्ष 


अगर आपके संगठन के आंतरिक संपरीक्षण आपको और उच्च प्रबंधन (top management) को असहज नहीं करते, तो वे आपकी प्रणाली की रक्षा नहीं कर रहे – सिर्फ सजावट कर रहे हैं।


पाँच ऐसे प्रश्न, जिनका उत्तर भी आतंरिक सम्परीक्षकों को आंतरिक संपरीक्षण में जरूर जानने का प्रयास करना चाहिए -


(1) क्या यह प्रक्रिया मौजूदा कर्मचारी के बिना चलेगी?


(2) अगर ग्राहक ऑर्डर दोगुना हो जाए तो क्या होगा?


(3) कौन सा नियंत्रण पिछले 6 महीने से 100 % अनुपालन दिखा रहा है? (यह संदेहास्पद हो सकता है!)


(4) क्या कोई जोखिम है जो अभी मुख्य निष्पादन संकेतक (KPI) में नहीं दिख रहा?


(5) कौन से “जुगाड़” (workarounds) अब स्थायी प्रक्रिया बन गए हैं?


इस प्रकार आपका आंतरिक संपरीक्षण अनुपालन का टिक-मार्क नहीं, बल्कि संगठन का सबसे शक्तिशाली रणनीतिक उपकरण (Strategic Tool) बन सकता है। 


सौजन्य - धन्यवाद, Buchi Okoro, आपकी फेसबुक पोस्ट के लिए जिसे पाठक यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं।


सादर,

केशव राम सिंघल 

#आईएसओ9001 #आतंरिकसंपरीक्षण #गुणवत्ताप्रबंधन #जोखिमआधारितसोच 

#ISO9001 #InternalAudit #QualityManagement #RiskBasedThinking 


रविवार, 14 दिसंबर 2025

संतुलित मूल्यांकन पत्रक (Balanced Scorecard)

 संतुलित मूल्यांकन पत्रक (Balanced Scorecard)

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

परिचय 


संतुलित मूल्यांकन पत्रक (Balanced Scorecard) एक रणनीतिक आयोजना और प्रबंधन (strategic planning and management) और प्रदर्शन मापन (performance measurement) का तंत्र (framework) या उपकरण (tool) है। इस मूल्यांकन पत्रक को 1992 में डॉ. रॉबर्ट कपलान (Robert S. Kaplan) और डॉ. डेविड नॉर्टन (David P. Norton) ने विकसित किया था। यह मूल्यांकन पत्रक पारंपरिक वित्तीय मापदंडों (financial metrics) से आगे बढ़कर संगठन के प्रदर्शन (performance) को चार अलग-अलग परिप्रेक्ष्य (Perspectives) से मापता (measure) है ताकि दीर्घकालिक रणनीति (long-term strategy) को प्रभावी ढंग से लागू (implement effectively) किया जा सके।


मुख्य परिपेक्ष्य 


संतुलित मूल्यांकन पत्रक के चार मुख्य परिप्रेक्ष्य (Four Perspectives) हैं, जिन्हें वित्तीय परिपेक्ष्य, ग्राहक परिपेक्ष्य, आंतरिक प्रक्रिया परिपेक्ष्य और सीख एवं विकास परिप्रेक्ष्य में विभाजित किया गया है। 


(1) वित्तीय परिप्रेक्ष्य (Financial Perspective) - इस परिपेक्ष्य के अंतर्गत संस्था यह मूल्यांकन करने का प्रयास करती है कि संस्था का वित्तीय स्वास्थ्य कैसा है तथा संस्था के शेयरधारक संस्था को कैसे देखते हैं? उदाहरण के लिए मुख्य निष्पादन संकेतक (KPIs) क्या हैं - राजस्व वृद्धि कितनी है, लाभ मार्जिन (profit margin) कितना है, नियोजित पूंजी पर प्रतिफल (ROCE - Return on Capital Employed) कितना है, लागत में कमी के तरीके अपनाए गए, नकदी प्रवाह नियोजित है आदि। इस मूल्यांकन का मुख्य केंद्रबिंदु (focus) यह होता है कि संस्था आर्थिक रूप से कितनी सफल है?


(2) ग्राहक परिप्रेक्ष्य (Customer Perspective) - इसके अंतर्गत संस्था यह मूल्यांकन करने का प्रयास करती है कि संस्था के ग्राहक संस्था को कैसे देखते हैं? उदाहरण के लिए मुख्य निष्पादन संकेतक (KPIs) क्या हैं - ग्राहक संतुष्टि मूल्यांकन, ग्राहक प्रतिधारण दर, बाजार हिस्सेदारी, शुद्ध प्रमोटर मूल्यांकन (NPS - Net Promoter Score), डिलीवरी समय आदि क्या हैं। इस मूल्यांकन का मुख्य केंद्रबिंदु (focus) यह होता है कि ग्राहकों की जरूरतें पूरी की जाएं और उनके लिए मूल्य (value) सृजित हो।


(3) आंतरिक प्रक्रिया परिप्रेक्ष्य (Internal Process Perspective) - इसके अंतर्गत संस्था यह मूल्यांकन करने का प्रयास करती है कि संस्था को किस चीज में उत्कृष्ट होना चाहिए? उदाहरण के लिए मुख्य निष्पादन संकेतक (KPIs) क्या हैं - उत्पादन चक्र समय, गुणवत्ता दर, प्रक्रिया दक्षता, नवाचार पाइपलाइन, ऑपरेशनल एक्सीलेंस, सप्लाई चेन प्रदर्शन आदि। इस मूल्यांकन का मुख्य केंद्रबिंदु (focus) यह होता है कि संस्था उन आंतरिक प्रक्रियाओं का पता लगाए जिनमें संस्था को सुधार करना जरूरी है।


(4) सीख एवं विकास परिप्रेक्ष्य (Learning and Growth Perspective) - इसके अंतर्गत संस्था यह मूल्यांकन करने का प्रयास करती है कि क्या संस्था निरंतर सुधार की ओर बढ़ रही है और मूल्य (value) सृजित कर पा रहे है? उदाहरण के लिए मुख्य निष्पादन संकेतक (KPIs) क्या हैं - कर्मचारी संतुष्टि, कर्मचारी टर्नओवर दर, प्रशिक्षण घंटे प्रति कर्मचारी, आईटी सिस्टम क्षमता, संस्था-संस्कृति, नवाचार की संख्या आदि। इस मूल्यांकन का मुख्य केंद्रबिंदु (focus) यह होता है कि संस्था में कर्मचारी, प्रणाली (system) और संस्था की प्रक्रियाओं की क्षमता बढे।


विशेषताएँ


संतुलित मूल्यांकन पत्रक संस्था की रणनीति को मापने योग्य बनाता है। यह संस्था की दूरदृष्टि (vision) और रणनीति (strategy) को ठोस लक्ष्य (concrete goals), मापदंड (measures), लक्ष्य मान (targets) और पहल (initiatives) में बदल देता है। कारण-और-प्रभाव संबंध (Cause-and-Effect Relationship) दृष्टि से देखा जाए तो चारों परिप्रेक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।  उदाहरण के लिए कर्मचारियों का बेहतर सीख और विकास (Learning & Growth), जिससे प्रक्रियाएँ (Internal Process) बेहतर होती है, परिणामस्वरूप बेहतर ग्राहक संतुष्टि (Customer satisfaction) और बेहतर वित्तीय परिणाम (Financial results) मिलते है। संतुलित मूल्यांकन पत्रक के अंतर्गत सामान्यतः एक रणनीति मानचित्र (Strategy Map) बनाया जाता है, जो यह दिखाता है कि कैसे निचले स्तर के लक्ष्य ऊपरी स्तर के वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करते हैं।


लाभ 


(1) संतुलित मूल्यांकन पत्रक केवल वित्तीय परिणामों पर केंद्रित नहीं करता, दीर्घकालिक संस्था के स्वास्थ्य पर भी ध्यान देता है।

(2) संतुलित मूल्यांकन पत्रक संस्था की रणनीति को पूरी संस्था में संरेखित (align) करता है।

(3) संतुलित मूल्यांकन पत्रक सभी स्तरों पर कर्मचारियों को स्पष्टता देता है कि उनका काम रणनीति से कैसे जुड़ा है।

(4) संतुलित मूल्यांकन पत्रक की नियमित समीक्षा से रणनीति में जरूरी सुधार किए जा सकते हैं।


वर्तमान में दुनिया की बहुत सी कंपनियाँ (जैसे Apple, Volkswagen, Tata Group, HDFC Bank, Reliance आदि भारतीय कंपनियाँ भी) और सरकारी / गैर-लाभकारी संस्थाएँ संतुलित मूल्यांकन पत्रक का उपयोग करते हैं।


संक्षेप में संतुलित मूल्यांकन पत्रक (Balanced Scorecard) केवल एक प्रदर्शन मापन उपकरण  (Performance measurement tool) ही नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक प्रबंधन प्रणाली (Strategic management system) है जो संस्था को उसकी अपनी रणनीति को सफलतापूर्वक लागू करने में मदद करता है। 


सादर,

केशव राम सिंघल 



रविवार, 7 सितंबर 2025

आगंतुकों का धन्यवाद (Thanks Visitors)

आगंतुकों का धन्यवाद (Thanks Visitors)

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गुणवत्ता जागरूकता (Quality Awareness) पर मेरे ब्लॉग्स को अब तक सात लाख पचहत्तर हजार से अधिक आगंतुकों (visitors) ने देखा है। यह मेरे लिए हर्ष और प्रेरणा का विषय है।

 

आज की स्थिति:

·       पुराना ब्लॉगQuality Concepts and ISO 9001:2008 QMS Awareness
आगंतुक: 5,50,800+
लिंक: iso9001-2008awareness.blogspot.com

·       वर्तमान ब्लॉगQuality Concepts and ISO 9001 QMS Awareness
आगंतुक: 1,79,200+
लिंक: qmsawareness.blogspot.com

·       यह हिंदी ब्लॉगगुणवत्ता और गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली पर जानकारी 

आगंतुक: 37,400+

 

आप सभी के सहयोग और स्नेहपूर्ण पढ़ने से मुझे लगातार लिखने और साझा करने की प्रेरणा मिलती है।


आगंतुकों का हार्दिक धन्यवाद।

 

सादर,
केशव राम सिंघल

बुधवार, 4 जून 2025

जागरूकता आलेख - गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (Quality Control Orders - QCO) - उपभोक्ता सुरक्षा की दिशा में एक सशक्त कदम

जागरूकता आलेख -  गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (Quality Control Orders - QCO) - उपभोक्ता सुरक्षा की दिशा में एक सशक्त कदम

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गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) भारत सरकार द्वारा जारी ऐसे नियामक प्रावधान हैं, जो सुनिश्चित करते हैं कि देश में उत्पादित, आयातित या विक्रय किए जाने वाले उत्पाद भारतीय मानकों (Indian Standards) का कड़ाई से पालन करें। ये आदेश भारत में निर्मित, आयातित या बेचे जाने वाले उत्पादों पर लागू होते हैं और इनका उद्देश्य उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित और विश्वसनीय उत्पाद उपलब्ध कराना है, जिससे भारतीय बाजार में घटिया सामान के प्रवेश को रोका जा सके। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) उत्पादों को प्रमाणित करने और QCO के अनुपालन को लागू करने के लिए जिम्मेदार है। 


गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों के प्रमुख पहलू 


1. उद्देश्य


- उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित और विश्वसनीय उत्पाद प्रदान करना। 

- घटिया एवं अविश्वसनीय उत्पादों के निर्माण और आयात पर रोक लगाना। 

- बाजार में उच्च गुणवत्ता बनाए रखना। 


2. कार्यान्वयन


- केन्द्र सरकार के अंतर्गत संबंधित नियामक मंत्रालय (Regulatory Ministries) गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) जारी करते हैं। 

- आदेश जारी होने के बाद संबंधित उत्पादों के लिए भारतीय मानकों की अपेक्षाओं (Requirements of Indian Standards) का अनुपालन अनिवार्य हो जाता है। 


3. भारतीय मानक ब्यूरो की भूमिका 


- भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) गुणवत्ता नियंत्रण आदेश के अंतर्गत सम्मिलित उत्पादों का प्रमाणन प्राधिकरण (Certification Authority) और प्रवर्तन प्राधिकरण (Enforcement Authority) है। 


- भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा प्रमाणित उत्पादों पर आईएसआई चिन्ह (ISI mark) लगाया जाता है। 


4. गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) का अनिवार्य अनुपालन


- गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) के अंतर्गत आने वाले उत्पादों पर आईएसआई चिन्ह (ISI mark) का होना अनिवार्य है। 


- बिना प्रमाणन वाले उत्पादों की बिक्री और आयात भारत में वर्जित है। 


- केन्द्र सरकार के अधीन विभिन्न नियामक मंत्रालय (Regulatory Ministries) समय-समय पर गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO)  जारी करते हैं। 


- गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) के प्रभावी होने के बाद संबंधित उत्पादों के लिए भारतीय मानकों का पालन अनिवार्य हो जाता है। 


5. गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) के गैर-अनुपालन के परिणाम 


- आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। 

- बिना प्रमाणन वाले उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध रहेगा। 

- बिना प्रमाणन वाले उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध रहेगा। 


6. गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) द्वारा कवर किए जाने वाले उत्पाद 


गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) द्वारा कवर किए जाने वाले उत्पादों की सूची दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। उदाहरण के लिए बहुत से उत्पाद निम्न से सम्बंधित हैं -  


- विद्युत उपकरण - स्विच, वायर, चार्जर आदि 

- स्टील एवं इस्पात उत्पाद - TMT बार, पाइप आदि

- रसायन - सॉल्वेंट, एसीड आदि 

- वस्त्र - हेलमेट लाइनर, सुरक्षात्मक वस्त्र 

- प्लास्टिक उत्पाद - किचनवेयर, टॉयज़ आदि 

- निर्माण सामग्री आदि 


7. गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) के अंतर्गत आए उत्पादों के लिए अनिवार्य प्रमाणन


भारत में गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) के अंतर्गत आए उत्पादों को बेचने से पहले निर्माताओं और आयातकों को भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) से प्रमाणन प्राप्त करना आवश्यक है। 


8. मानकीकरण और उपभोक्ता संरक्षण


- गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) उत्पादों में एकरूपता, विश्वसनीयता और गुणवत्ता सुनिश्चित करते हैं। 

- उपभोक्ताओं को घटिया उत्पादों के बाजार में न होने से सुरक्षा मिलती है और उन्हें सुरक्षित और विश्वसनीय सामान मिलता है। 


9. व्यापार विनियमन


घटिया उत्पादों के आयात पर रोक लगाने और भारतीय आंतरिक बाजार को संरक्षित करने हेतु गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO)  एक सशक्त उपकरण है। 


सार 


गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) केवल एक कानूनी अनिवार्यता नहीं, बल्कि उपभोक्ता हित और देश की औद्योगिक छवि को सुरक्षित रखने का माध्यम भी हैं। गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO)  के प्रभावी कार्यान्वयन से भारतीय बाजार में घटिया उत्पादों का प्रवेश रोका जा सकता है, जिससे उपभोक्ताओं का विश्वास और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित होती है।


विशिष्ट गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) और उनके विवरण के बारे में अधिक जानकारी के लिए, आप भारतीय मानक ब्यूरो की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।


सादर,

केशव राम सिंघल