शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

ISO 9001 - प्रमाणपत्र लक्ष्य नहीं, संगठन-संस्कृति

ISO 9001 - प्रमाणपत्र लक्ष्य नहीं, संगठन-संस्कृति

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe

एबीसी कंपनी (काल्पनिक नाम) के मैनेजिंग डायरेक्टर अशोक प्रधान (काल्पनिक नाम) पिछले कुछ दिनों से काफी परेशानी महसूस कर रहे थे। अंततः उन्होंने कंपनी के उच्च-अधिकारियों, प्लांट मैनेजर, यूनिट्स इंचार्जों की एक मीटिंग बुलाई, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में अपनी बात की शुरुआत करते हुए कहा — “हम ISO 9001 के कार्यान्वयन में असफल हो गए। इसलिए नहीं कि मानक में कोई कमी है या हमने उसे पढ़ा नहीं, बल्कि इसलिए कि हमने उसे नाटकीय ढंग से लागू किया।” सभी प्रतिभागियों को मैनेजिंग डायरेक्टर का कथन चौंकाने वाला लगा। मीटिंग में एक चुप्पी छा गई। सभी मन ही मन सोचने लगे। अशोक प्रधान ने संगठन की कड़वी सच्चाई लोगों के सामने बिना किसी राग लपेट के रख दी। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा - "हमने एक प्रतिष्ठित सलाहकार की सेवाएँ लीं। प्रक्रियाएँ बड़ी सावधानी से लिखी गईं। दस्तावेज़ आकर्षक थे, भाषा प्रभावशाली थी, संरचना व्यवस्थित थी। कागज़ों पर हमारी प्रबंध प्रणाली उत्कृष्ट दिखाई देती थी और उसी के आधार पर हमने ISO 9001 प्रमाणन भी प्राप्त कर लिया। हम खुश हो गए कि हम अब एक ISO 9001 प्रमाणन संगठन हैं। परंतु हम एक मूल प्रश्न भूल गए कि क्या हमारे संगठन के तय प्रक्रियाओं का वास्तविक अनुपालन हो रहा है? हमने यह जानने का प्रयास ही नहीं किया कि हमारी प्रणाली में वास्तविक कमियाँ क्या हैं। हमने आत्म-मूल्यांकन के बजाय संपरीक्षण (Audit) की तैयारी को प्राथमिकता दी। धीरे-धीरे हमारी ऊर्जा “प्रणाली सुधार” से हटकर “ऑडिट पास करने” में लग गई।" 


किसी संगठन का सर्वोच्च नेतृत्व जब अपनी विफलता स्वीकार करता है, तब वह विफलता नहीं, परिवर्तन की शुरुआत होती है। अशोक प्रधान अपने संगठन के लोगों को आईना दिखा रहे थे और सभी चुपचाप उन्हें सुन रहे थे। आगे उन्होंने कहा, "परिणामस्वरूप हमारी ISO 9001 प्रबंध प्रणाली एक जीवंत प्रबंधन उपकरण के स्थान पर एक “दिखावे की वस्तु” बन गई— संपरीक्षकों के लिए दिखावा, ग्राहकों के लिए दिखावा, प्रमाणन संस्था के लिए दिखावा। और यह दिखावा करते हुए किसी प्रकार हमें प्रमाणपत्र मिल गया। पर क्या प्रमाणपत्र मिलने से हमारे संगठन का संचालन स्थिर और सुचारु हो गया? क्या प्रचालन समस्याएँ रुक गईं? क्या ग्राहक संतुष्ट हो गए? सच्चाई यह है कि हमारे संगठन का संचालन अभी भी नाजुक स्थिति में है। समस्याएँ दोहराई जा रही हैं। अधिकतर यूनिट्स की लीडरशिप अभी भी दैनिक संकटों में उलझी रहती है। ग्राहक असंगतता अनुभव करते हैं।"


जो कुछ अशोक प्रधान ने अपने साथियों से कहा उस सब में ISO 9001 के “दिखावटी अनुपालन” बनाम “वास्तविक कार्यान्वयन” की जो पीड़ा उभरकर आती है, वही आज अनेक संगठनों की सच्चाई है। अशोक प्रधान ने मूल समस्या को सही पकड़ा है — एबीसी कंपनी में प्रणाली बनाई गई, पर जी नहीं गई।


यदि हम वास्तविकता का विश्लेषण करें तो कुछ मूल प्रश्न हमारे सामने आते हैं। पहला प्रश्न, क्या संगठन की ISO 9001 प्रबंध प्रणाली संगठन के व्यापार को सुरक्षित कर रही है? यदि प्रणाली समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुँच रही, जोखिमों की पहचान नहीं कर रही, यदि सुधारात्मक कार्रवाई प्रभावी नहीं है, और नेतृत्व डेटा-आधारित निर्णय नहीं ले रहा, तो वह व्यापार को संरक्षित नहीं कर रही — केवल औपचारिकता निभा रही है। दूसरा प्रश्न, क्या ISO 9001 केवल प्रमाणन का उपकरण बन गया है? जब ऑडिट की तैयारी संस्था की प्राथमिकता बन जाए, दस्तावेज़ वास्तविक अभ्यास से अलग हो जाएँ, कर्मचारी प्रक्रियाओं को “अतिरिक्त बोझ” समझें, तब प्रणाली “सर्टिफिकेट प्राप्ति का साधन” बन जाती है, न कि “प्रबंधन का साधन”। हमें सोचना होगा कि वास्तविक अपेक्षाएँ क्या हैं? आखिर ISO 9001 का उद्देश्य है क्या? ISO 9001 एक दस्तावेज़ी प्रणाली नहीं, बल्कि प्रबंधन की कार्य-पद्धति है। यह ‘क्या लिखना है’ से अधिक ‘कैसे जीना है’ का मानक है।


हम इस स्थिति को कैसे सुधार सकते हैं? कुछ उपाय सामने हैं। पहला, नेतृत्व को सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। ISO 9001 केवल गुणवत्ता विभाग या किसी एक की जिम्मेदारी नहीं है। शीर्ष नेतृत्व सहित सभी को प्रणाली “जीनी” होगी। दूसरा, संगठन की प्रक्रियाओं का अनुपालन और मापन हो। लिखित प्रक्रिया तभी सार्थक है जब उसका पालन हो, उसके निष्पादन को मापा जाए, और विचलनों पर सुधार कार्यवाही हो। तीसरा, संगठन को जोखिम-आधारित सोच अपनानी होगी। समस्याओं के घटित होने की प्रतीक्षा नहीं — जोखिमों की पूर्व पहचान और निवारण के लिए काम करना होगा। चौथा, संगठन को आंतरिक संपरीक्षण का उद्देश्य बदलना होगा। यह समझना होगा कि संपरीक्षण का उद्देश्य “पकड़ना” नहीं, बल्कि “सुधार के अवसर खोजना” होना चाहिए। पाँचवाँ, संगठन में PDCA चक्र को जीवंत करना होगा। Plan–Do–Check–Act केवल दीवार पर लिखा न रहे, बल्कि दैनिक संचालन का हिस्सा बने। निष्कर्ष तौर पर हम कह सकते हैं कि ISO 9001 कभी भी गंतव्य नहीं है। यह प्रमाणपत्र पाने की मंजिल नहीं, बल्कि संचालन उत्कृष्टता की निरंतर यात्रा है। 


प्रमाणपत्र एक परिणाम है। संगठन की सशक्त प्रबंध प्रणाली उसका कारण है। यदि संगठन कारण पर ध्यान देगा, परिणाम स्वयं आएगा। पर यदि संगठन केवल परिणाम (प्रमाणपत्र) पर केंद्रित रहेगा, तो प्रणाली दिखावे में बदल जाएगी। अंतिम विचार के तौर पर हम कह सकते हैं कि गुणवत्ता प्रणाली तब जीवंत होती है जब नेतृत्व प्रतिबद्ध हो, कर्मचारी सहभागी हों, प्रक्रियाएँ व्यवहार में हों, और सुधार निरंतर हो। अन्यथा ISO 9001 केवल दीवार पर टंगा एक प्रमाणपत्र रह जाता है। ISO 9001 प्रमाणपत्र पाना संगठन का लक्ष्य नहीं, बल्कि संगठन-संस्कृति को सुधारना संगठन का लक्ष्य होना चाहिए। ISO 9001 प्रणाली बनाना आसान है, पर उसे संगठन-संस्कृति बनाना कठिन है। गुणवत्ता प्रमाणपत्र से नहीं, व्यवहार से आती है। 


ISO 9001 मात्र अनुपालन (Compliance) का नहीं, बल्कि प्रभावशीलता (Effectiveness) का मानक है। केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं कि कोई प्रक्रिया दस्तावेज़ों में मौजूद है; आवश्यक यह है कि वह व्यवहार में लागू हो और संगठन को मापनीय तथा सार्थक परिणाम दे रही हो।


सादर, 

केशव राम सिंघल 

 

 

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

गुणवत्ता के लिए उच्च-प्रबंधन की भूमिका

 गुणवत्ता के लिए उच्च-प्रबंधन की भूमिका 

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

गुणवत्ता केवल दस्तावेज़ों का विषय नहीं है — यह नेतृत्व की सोच और प्रतिबद्धता से प्रारंभ होती है। ग्यारह ऐसे कार्य जिन पर उच्च-प्रबंधन को विशेष ध्यान देना चाहिए - 


1. स्पष्ट गुणवत्ता नीति और उद्देश्य निर्धारित करना 

   संगठन की दिशा स्पष्ट हो। गुणवत्ता नीति व्यावहारिक, मापनीय तथा व्यवसायिक लक्ष्यों से जुड़ी हो।


2. नेतृत्व द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करना

   केवल निर्देश देने से नहीं, बल्कि व्यवहार से गुणवत्ता संस्कृति विकसित होती है। जैसा कि W. Edwards Deming ने कहा था – “A bad system will beat a good person every time.” 


   उच्च-प्रबंधन को गुणवत्ता के प्रति व्यवहारिक रूप से स्वयं रुचि लेकर ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, जिससे एक सुदृढ़ प्रणाली विकसित हो और प्रत्येक कर्मचारी उसे कार्यान्वित करने के लिए प्रेरित हो।


   उदाहरण के तौर पर, हमने देखा है कि अनेक संगठनों में आंतरिक संपरीक्षण (Internal Audit) के दौरान उच्च-प्रबंधन का संपरीक्षण नहीं किया जाता। नेतृत्व को स्वयं आंतरिक संपरीक्षण टीम को निर्देश देना चाहिए कि वे उनका भी संपरीक्षण करें और उनकी कमियों को इंगित करें, ताकि उनमें भी सुधार किया जा सके। यही वास्तविक नेतृत्व है।


3. ग्राहक की आवाज़ (Voice of Customer) को प्राथमिकता देना 

   ग्राहक संतुष्टि, शिकायतों का विश्लेषण तथा प्राप्त फीडबैक को रणनीतिक निर्णयों में सम्मिलित करना।


4. जोखिम-आधारित सोच (Risk-Based Thinking) अपनाना

   संभावित जोखिमों एवं अवसरों की पहचान कर समय रहते निवारक और सुधारात्मक कदम उठाना।


5. सक्षम एवं प्रशिक्षित मानव संसाधन विकसित करना

   नियमित प्रशिक्षण, कौशल-विकास और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से कर्मचारियों को सशक्त बनाना।


6. प्रक्रियाओं का मानकीकरण एवं निरंतर सुधार

   PDCA (Plan-Do-Check-Act) चक्र के प्रभावी कार्यान्वयन पर ध्यान देकर निरंतर सुधार की संस्कृति को बढ़ावा देना। मानकीकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्था आईएसओ (ISO - International Organization for Standardization) द्वारा प्रकाशित ISO 9001:2015 भी निरंतर सुधार (Continual Improvement) पर विशेष बल देता है।


7. पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना 

   उपयुक्त मानव संसाधन, अवसंरचना, आधुनिक तकनीक तथा सटीक मापन उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना। यह ऐसा क्षेत्र है, जहाँ नेतृत्व की स्वीकृति और सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक होती है।


8. डेटा-आधारित निर्णय लेना 

   निर्णय तथ्यों, विश्लेषण तथा प्रमाणित आँकड़ों के आधार पर लिए जाएँ, न कि केवल अनुभव या अनुमान के आधार पर।


9. प्रभावी आंतरिक संचार प्रणाली विकसित करना 

   गुणवत्ता लक्ष्यों, परिवर्तित कार्यविधियों, उपलब्धियों और चुनौतियों की जानकारी संगठन के प्रत्येक स्तर तक स्पष्ट रूप से पहुँचे।


10. निष्पादन (Performance) की नियमित समीक्षा (Management Review)

    नियमित प्रबंधन समीक्षा बैठकों में गुणवत्ता उद्देश्यों, मुख्य निष्पादन संकेतकों (KPIs), ऑडिट परिणामों तथा सुधारात्मक कार्यों की समग्र समीक्षा करना।


11. गुणवत्ता संस्कृति (Quality Culture) को बढ़ावा देना 

    दोषारोपण (Blame Culture) के स्थान पर सीखने और सुधार की संस्कृति विकसित करना। कर्मचारियों को सुझाव देने, नवाचार करने और उत्तरदायित्व लेने के लिए प्रोत्साहित करना।


सार 


यदि उच्च-प्रबंधन जागरूक, प्रतिबद्ध और सक्रिय रहता है, तो पूरा संगठन गुणवत्ता के प्रति जागरूक हो जाता है। गुणवत्ता केवल किसी एक विभाग का उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि नेतृत्व की प्रतिबद्धता का प्रत्यक्ष परिणाम होती है।


सादर, 

केशव राम सिंघल 



गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

शीर्ष प्रबंधन की सोच और गुणवत्ता के प्रति दृष्टिकोण

शीर्ष प्रबंधन की सोच और गुणवत्ता के प्रति दृष्टिकोण 

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एक दिन मुझे दो कंपनियों को देखने तथा उनके शीर्ष प्रबंधन से मिलने का अवसर मिला।


जब मैं पहली कंपनी में पहुँचा, तो मुझे बताया गया कि यह कंपनी ISO 9001:2015 प्रमाणित है। एक शीर्ष प्रबंधक के चैंबर में ISO प्रमाणन का प्रमाणपत्र दीवार पर टंगा हुआ भी दिखाई दिया। मैंने उनकी उत्पादन इकाइयों (Manufacturing Units) का दौरा किया। वहाँ मैंने देखा कि सुपरवाइजर्स (Supervisors) ऑपरेटर्स (Operators) की अत्यंत सतर्कता से निगरानी कर रहे थे। इंस्पेक्टर्स (Inspectors) तैयार माल (Finished Goods) की जाँच कर रहे थे। जैसे ही कोई कमी (Defect) पाई जाती, उस नॉन-कन्फॉर्मिंग उत्पाद (Nonconforming Product) को अलग कर दिया जाता। ऑपरेटर्स को चेतावनी (Warning) दी जाती तथा अच्छी तरह काम करने का दबाव डाला जाता। उत्पादन इकाई की दीवारों पर लक्ष्य स्पष्ट रूप से प्रदर्शित थे। उत्पादन तो हो रहा था, परंतु वातावरण में तनावपूर्ण खामोशी और दबाव का अनुभव हुआ।


इसके बाद मैं दूसरी कंपनी में गया। वहाँ शीर्ष प्रबंधन ने बताया कि उन्होंने अभी तक ISO मानकों के अनुपालन का कोई प्रमाणन (Certification) नहीं लिया है। हालाँकि वे ISO 9001:2015 तथा ISO 14001:2015 को कार्यान्वित करने की योजना बना रहे हैं और इसके लिए कुछ कर्मचारियों को प्रशिक्षण हेतु भेजा गया है। जब मैंने उनकी उत्पादन इकाइयों का निरीक्षण किया, तो पाया कि इस कंपनी में प्रक्रियाएँ (Processes) अत्यंत स्पष्ट रूप से परिभाषित थीं। दीवारों पर कार्य निर्देश (Work Instructions) लिखे हुए थे। समस्याओं पर खुले रूप से चर्चा हो रही थी और ऑपरेटर्स से सुझाव माँगे जा रहे थे कि प्रक्रिया को कैसे और बेहतर बनाया जा सकता है। यहाँ मुख्य ध्यान इस बात पर था कि प्रक्रियाएँ सही ढंग से चलें और यदि कोई कमी हो तो उसे पहचानकर सुधार किया जाए। जब मैंने यहाँ नॉन-कन्फॉर्मिंग उत्पादों के बारे में जानकारी माँगी, तो बताया गया कि प्रक्रियाओं की निरंतर निगरानी और सुधार के कारण यहाँ ऐसे उत्पाद बहुत कम होते हैं। और यदि कभी कोई नॉन-कन्फॉर्मिंग उत्पाद बन भी जाता है, तो ऑपरेटर्स और टीम मिलकर यह विचार करती है कि प्रक्रिया में कौन-सी कमी रही और उसे कैसे दूर किया जाए। इस कंपनी का वातावरण शांत, सकारात्मक और सहयोगपूर्ण लगा। यहाँ तनाव या भय का अनुभव नहीं हुआ।


मेरी राय में पहली कंपनी अधिक तनावग्रस्त और रक्षात्मक (Defensive) प्रतीत हुई, जबकि दूसरी कंपनी शांत, स्थिर (Stable) और सुधार-उन्मुख दिखाई दी। मुझे लगता है कि इन दोनों कंपनियों के बीच वास्तविक अंतर उनके शीर्ष प्रबंधन की सोच और गुणवत्ता के प्रति दृष्टिकोण में है। जहाँ पहली कंपनी प्रमाणन को लक्ष्य मानकर चल रही थी, वहीं दूसरी कंपनी लगातार सुधार (Continual Improvement) को गुणवत्ता संस्कृति (Quality Culture) बनाकर आगे बढ़ रही थी।


अनुभव आधारित सीख - प्रमाणन से अधिक महत्वपूर्ण है गुणवत्ता संस्कृति और लगातार सुधार।


सादर,

केशव राम सिंघल